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© Bakul Raut
Abstract Fluid Forms

देश मेरा

देश मेरा आजाद हुआ है,

यह सुनते आ रहा हूं मैं !

आजादी क्या होती है,

शायद अब भूलने लगा हूं मैं !

 

अंग्रेज चले गए इस देश से अब तो,

कुछ परछाइयां छोड़ गए,

गए थे जब वह !

 

शायद इसी भूरी परछाई में व्यस्त है कुछ,

जात पात की लड़ाई में, वह है अभी भी मस्त !

 

यहां अभी इंसाफ भी बिकता है,

और सिर्फ भ्रष्ट ही टिकता है !

 

कानून तो कब से अंधा ही था,

अभी उजाला हमें भी काम ही दिखता है !

 

तकलीफ में है सारे, फिर भी कुछ कहते नहीं,

हां आजादी मिली तो है, मगर यह दिल से कहते नहीं !

 

अब लग रहा है की अच्छे दिन भी आएंगे,

बुराई का हाथ हम पर से उठाएंगे !

 

आशा इसी उम्मीद पर टिकी हुई है,

निगाहें उसी कीचड़ पर टिकी हुई है,

एक फूल फिर से खेलेगा,

और मेरे देश को सच में आजाद कहलायेगा !

 

जय हिंद !

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© Bakul Raut
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