

गली का शेर
आखिर मै भी एक जान ही हु,
बस छल कपट से अंजान हु |
कभी किसी गली का शेर होता हु
तो कभी इंसान से भी डरता हु |
कोई रोटी दे तो खा के सोता हु
और कुछ ना मिले तो कर ही क्या पाता हु |
मुझे ना डाटने का शौक है ना काटने का
एक बार इंसान पे तुम भौक के तो देखो
काटने की फिदरत वो भी रखता है |
कुदरत ने तुम्हे ऐसे बना दिया
तो वैसे हम भी कुदरत की ही देन है |
बस हर बार हम पे गुर्राने से क्या फायदा
अब तो इन्साफ ने भी किया है अजीब कायदा |
मेरी तो किस्मत हर दिन ही बदलती है
तुम थोड़ा अपने आप को भी बदल के देखो |
जरा पूछो मेरे पूछ से, तुम्हे देख वो हिलती है क्यों ऐसे
एक मुरझाये हुए फूल में जान लौट आयी हो जैसे |
मुझे मारने उठायी तुमने उठायी जो छड़ी है
कसम से, तुम्हारी रक्षा मुझे जान से भी बड़ी है |
भूक मुझे भी लगती होगा ना साब
तुम्हारे सिवा है ना मेरे माई ना बाप |
एक बार प्यार से पुकार के तो देखो
इस पुकार की शुरुआत कर के तो देखो |
गली का कुत्ता ही सही, जान है मुझमे भी वही
थोड़ा नज़रिये का फरक है, बाकि तुम जानो क्या गलत क्या सही |
शेर बनो तो शेर दिल से बनो
गली में एक और भी है ये जानो |
हमें भी जीने दो, थोड़ा तुम भी जी लो.
