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© Bakul Raut
Abstract Fluid Forms

गली का शेर

आखिर मै भी एक जान ही हु, 
बस छल कपट से अंजान हु |


कभी किसी गली का शेर होता हु
तो कभी इंसान से भी डरता हु  |


कोई रोटी दे तो खा के सोता हु
और कुछ ना मिले तो कर ही क्या पाता हु |


मुझे ना डाटने का शौक है ना काटने का 
एक बार इंसान पे तुम भौक के तो देखो 
काटने की फिदरत वो भी रखता है |

 
कुदरत ने तुम्हे ऐसे बना दिया 
तो वैसे हम भी कुदरत की ही देन है |
बस हर बार हम पे गुर्राने से क्या फायदा 
अब तो इन्साफ ने भी किया है अजीब कायदा |


मेरी तो किस्मत हर दिन ही बदलती है
तुम थोड़ा अपने आप को भी बदल के देखो |


जरा पूछो मेरे पूछ से, तुम्हे देख वो हिलती है क्यों ऐसे 
एक मुरझाये हुए फूल में जान लौट आयी हो जैसे |


मुझे मारने उठायी तुमने उठायी जो छड़ी है
कसम से, तुम्हारी रक्षा मुझे जान से भी बड़ी है |


भूक मुझे भी लगती होगा ना साब 
तुम्हारे सिवा है ना मेरे माई ना बाप |


एक बार प्यार से पुकार के तो देखो 
इस पुकार की शुरुआत कर के तो देखो |


गली का कुत्ता ही सही, जान है मुझमे भी वही 
थोड़ा नज़रिये का फरक है, बाकि तुम जानो क्या गलत क्या सही |


शेर बनो तो शेर दिल से बनो 
गली में एक और भी है ये जानो |


हमें भी जीने दो, थोड़ा तुम भी जी लो.

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© Bakul Raut
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